Thursday, January 23, 2020

Remembering: गांधीजी की विचारधारा के खिलाफ थे नेताजी, डॉक्टर की बेटी को दे बैठे थे दिल

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डिजिटल डेस्क, मुम्बई। जब भी कभी आजादी से जुड़े किस्सों और देशभक्ति की बात होती है। नेताजी सुभाष चंद्र का नाम जरुर याद किया जाता है। गांधी जी की अंहिसा विचारधारा से सहमत न होने के बावजूद, नेताजी पहले ऐसे व्यक्ति ​बनें, जिन्होंने महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता कहकर संबोधित किया था। उन्होंने ही देशवासियों को 'तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा...' जैसे नारे देकर नई ऊर्जा से भर दिया। उनकी विचाराधारा ने लोगों को देश की आजादी के लिए प्रेरित किया। देश को आजाद कराने में नेताजी का बहुत बड़ा योगदान है। अंग्रेजों के खिलाफ बिगुल फूंकने वाले नेताजी सुभाष चंद्र बोस के बारे में ​जितनी बातें कहीं जाए उतनी कम है। लेकिन आज उनकी जयंती पर जानते हैं उनके बारे में कुछ खास बातें...

सिविल सर्विस में हासिल किया चौथा स्थान 
नेताजी सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को उड़ीसा में कटक के एक संपन्न बंगाली परिवार में हुआ था। बोस के पिता का नाम जानकीनाथ बोस और मां का नाम प्रभावती था। जानकीनाथ बोस कटक शहर के मशहूर वकील थे। प्रभावती और जानकीनाथ बोस की कुल 14 संतानें थी, जिसमें 6 बेटियां और 8 बेटे थे। सुभाष चंद्र उनकी नौवीं संतान और पांचवें बेटे थे। नेताजी ने प्रारंभिक पढ़ाई कटक के रेवेंशॉव कॉलेजिएट स्कूल में हुई। तत्पश्चात् उनकी शिक्षा कलकत्ता के प्रेजिडेंसी कॉलेज और स्कॉटिश चर्च कॉलेज से हुई। बाद में भारतीय प्रशासनिक सेवा की तैयारी के लिए उनके माता-पिता ने उन्हें इंग्लैंड के केंब्रिज विश्वविद्यालय भेज दिया। इसके बाद सिविल सर्विस की परीक्षा में उन्होंने चौथा स्थान प्राप्त किया।

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गांधी से खिलाफ जाकर अपनाया अलग रास्ता
देश में चल रही परिस्थितियों के चलते नेताजी ने कुछ समय बाद सिविल सर्विस छोड़ दी और देश को आजाद कराने के लिए वे कांग्रेस और गांधी जी के साथ जुड़ गए। गांधी जी के साथ रहते हुए उन्हें बहुत जल्द यह समझ आने लगा कि अंहिसा के साथ इस देश को आजाद नहीं करवाया जा सकता। इसलिए वे गांधी के खिलाफ हो गए और हिंसा का रास्ता अपनाया।  देश को आजाद करवाने के लिए उन्हें कई बार जेल भी जेल भी जाना पड़ा। भारत को स्वतंत्र कराने के उद्देश्य से उन्होंने 21 अक्टूबर, 1943 को आज़ाद हिन्द सरकार की स्थापना की और इस सेना के विस्तार के लिए कई देशों से सहायता भी ली। लेकिन इसका कोई सार्थक असर नजर नहीं आया। इसके बावजूद उनका प्रयास काफी सराहनीय रहा। 

डॉक्टर की बेटी पर आया दिल
निजी जिंदगी की बात की जाए तो नेताजी एक बार नेताजी अपने इलाज के लिए 1934 में ऑस्ट्रिया गए। उस समय उन्हें अपनी पुस्तक लिखने के लिए एक अंग्रेजी जानने वाले टाइपिस्ट की जरूरत थी। उनके एक मित्र ने एमिली शेंकल नाम की एक ऑस्ट्रियन महिला से उनकी मुलाकात कराई। एमिली के पिता एक प्रसिद्ध पशु चिकित्सक थे। एमिली ने सुभाष के टाइपिस्ट का काम किया। बस! इसी दौरान सुभाष एमिली को दिल दे बैठे। दोनों ने साल 1942 में बाड गास्टिन नामक स्थान पर हिंदू रीति-रिवाज से विवाह कर लिया। दोनों की एक बेटी भी हुई, जिसका नाम अनिता बोस रखा गया। 

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रहस्यमय रहा निधन
देश की लड़ाई में उलझे सुभाष अपने परिवार पर थोड़ा कम ध्यान दे सके। उन्होंने अपनी बेटी को पहली बार तब देखा, जब वह एक महीने से भी कम की थी। 18 अगस्त 1945 को एक विमान दुर्घटना के दौरान बोस ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। उस वक्त की उनकी बेटी अनिता बोस महज 2 साल 9 महीने की थी। बोस का निधन हमेशा विवादास्पद रहा। उनका निधन एक अनसुलझा रहस्य है। उनके प्रशंसक नहीं मानते कि बोस का निधन इस तरह हुआ। 



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